• नगरपालिकाबोर्ड द्वारा शहर के सौन्दर्य को बढ़ावा देने के लिए किए जा रहे कार्यों में 56 लाख के कार्य और जुड़ गए हैं। नगरपालिका द्वारा शहर की सीमा पर जयपुर एवं पाली की तरफ विशाल एवं भव्य प्रवेश द्वारों का निर्माण करवाया जाएगा। पालिकाध्यक्ष श्री दिनेश कुमार मीणा ने बताया कि शहर में चारों ओर सौन्दर्यकरण का कार्य चल रहा है। नगरपालिका सीमा में पाली एवं जयपुर की तरफ से प्रवेश सीमा पर 26 -26 लाख की लागत से दो प्रवेश द्वारों का निर्माण करवाया जाएगा।

खूब पानी पियें

भीषण गर्मी की वजह से शरीर से पसीना बहना आम है लेकिन इससे आपके शरीर में डिहाइड्रेशन, लो ब्लड प्रेशर, सिरदर्द, थकान, भूख में कमी जैसे लक्षण महसूस हो सकते हैं। चमकी बुखार के लक्षण भी कुछ इसी तरह के है इसलिए बच्चों में पानी की कमी नहीं होने दें। बच्चों को समय-समय पर पानी पिलाते रहे। इससे उन्हें हाइड्रेट रहने और बीमारियों से बचने में मदद मिलेगी।

बच्चों को गर्मी से बचाएं

देशभर में इस समय भीषण गर्मी पड़ रही है। जिसका सबसे ज्यादा असर बच्चों पर पड़ रहा है। अधिक गर्मी से शरीर से ज्यादा पसीना आने लगता है और यही वजह की शरीर में पानी की कमी होने लगती है। तेज धूम की वजह से सनबर्न का भी खतरा रहता है। ऐसे में बच्चों को तेज धूम में बाहर ना जाने दें और उन्हें ठंडी चीजें खिलाएं।

शरीर को रखें ठंडा

भीषण गर्मी से बचने के लिए अपने शरीर को ठंडा रखने की कोशिश करे। गर्मी में अपने बच्चों को 2 से 3 बार नहलाएं। बच्चों को ठंडी चीजे खाने के लिए दें। चीनी-नमक का घोल, छाछ, शिकंजी के अलावा तरबूज, खरबूज, खीरे जैसी चीजों का खूब सेवन करवाएं। बच्चों को बुखार होने पर पेरासिटामोल की गोली या फिर डॉक्टर को दिखाएँ।

चमकी बुखार के नुस्के

ओआरएस का घोल भी है जरूरी

वैसे तो आप बच्चों को तापमान बनाये रखने के लिए चीनी-नमक का घोल, छाछ, शिकंजी के अलावा तरबूज, खरबूज दे सकते हैं लेकिन इनके साथ आप उन्हें ओआरएस का घोल भी दे सकते हैं। इससे बच्चों को न सिर्फ ऊर्जा मिलती है बल्कि शरीर हाइड्रेट रहता है और गर्मी से बचाव होता है।

इन बातों का रखे ध्यान

– चमकी बुखार के लक्षणों में लगातार कुछ दिनों तक तेज बुखार आना

– शरीर में कभी ना ख़त्म होने वाली कमजोरी

– शरीर में एंठन होना

– सुस्ती, सिरदर्द, उल्टी, कब्ज, बेहोशी, कोमा और लकवा आदि शामिल हैं।

इस तरह का कोई भी लक्षण दिखने पर तुरंत डॉक्टर के पास जाएं।

फेफड़ों की समस्या को बढ़ाने वाले कारक

 अगर फेफड़े स्‍वस्‍थ हों तो शरीर भी स्‍वस्‍थ रहता है, क्‍योंकि यह शरीर की सफाई करता है, लेकिन वर्तमान में फेफड़ों की बीमारियों की समस्‍या बढ़ती जा रही है, इसके लिए कुछ अजीब कारक जिम्‍मेदार हो सकते हैं।

जीवित रहने के लिए सांस लेना जरूरी है। लेकिन जिन लोगों को फेफड़ों अर्थात लंग की बीमारी है उनको अस्थमा जैसी बीमारी होने की आशंका भी अधिक रहती है। उनको सांस लेने में भी तकलीफ होती है। आज की जीवनशैली में फेफड़ों की बीमारियां भी बढ़ती जा रही हैं और इसके पीछे कुछ ऐसे कारक भी हैं जिनकी वजह से फेफड़ों की समस्या बढ़ रही है। चलिये जानें कि फेफड़ों की समस्या बढ़ाने वाले ये अजीब कारक कौन से हैं -  

प्रदूषण और आनुवंशिक कारण

अस्थमा श्वास संबंधी एक रोग है। इससे श्वासन नलियों में सूजन आ जाती है और वे सिकुड़ जाती हैं, जिससे सांस लेने में परेशानी होने लगती है। इसके लिए पर्यावरण प्रदूषण और आनुवंशिक कारण प्रमुख रूप से जिम्मेदार होते हैं। साथ ही उन लोगों को भी विशेष सावधानी रखनी चाहिए, जिन्हें धूल, धुआं, पालतू जानवरों और किसी दवा आदि से एलर्जी होती है।

 तंबाकू का सेवन से फेफडों का कैंसर

एक या दोनों फेफडों में असामान्य कोशिकाओं के अनियंत्रित रूप से विकासित होने पर वायुमार्ग के अंदर परत बन जाती है। ये बहुत तेजी से विभाजित होती हैं और टय़ूमर का रूप ले लेती हैं। फेफडों के कैंसर के 10 में से 9 मामले में तंबाकू का सेवन ही कारण होता है। वातावरण में एसबेस्टस घुला होने के कारण भी ये समस्या होती है। 

 पटाखों के धुएं से

अस्थमा के रोगियों और कम उम्र के बच्चों को पटाखों और इनके धुएं से बचाकर रखना चाहिये। अस्थमा और पटाखे एक बेहद हानिकारक कॉम्बिनेशन है। पटाखों के जलने से निकलने वाला रसायन और टॉक्सिक धूल के कण वायु प्रदूषण को 200 प्रतिशत बढ़ा देता है, लोगों के अस्थमा को अचानक बहुत ज्यादा बढ़ा देता है। पटाखे छोटे बच्चों में ब्रांकिल अस्थमा को बढ़ाने वाला एक बड़ा कारक है। 

 हृदय से संबंधित समस्याओं से

पल्मोनरी इडेमा एक ऐसी स्थिति है, जो फेफड़ों में तरल पदार्थ भरने के कारण हो जाती है। इससे सांस लेने में तकलीफ होती है। इसका सबसे प्रमुख कारण हृदय से संबंधित समस्याएं होती हैं। इसके अलावा न्युमोनिया तथा विषैले तत्वों से संपर्क में आने व कुछ दवाओं से भी यह हो सकता है। इसके अलावा धूम्रपान इसका सबसे प्रमुख कारण होता है। 

 कुछ चीजों से एलर्जी के कारण

अनेक लोगों में एलर्जी के कारण अस्थमा का अटैक आ सकता है। यह एलर्जी मौसम, खाद्य पदार्थ, दवाइयाँ इत्र, परफ्यूम जैसी खुशबू और कुछ अन्य प्रकार के पदार्थों से हो सकती हैं। वहीं कुछ लोगों को रुई के बारीक रेशों, आटे की धूल, कागज की धूल, कुछ फूलों के पराग, पशुओं के बाल, फफूंद और कॉकरोज जैसे कीड़ों के प्रति एलर्जित होते हैं। 

 बरसात के बाद

बरसात होने के बाद नमी बनी रहती है। लेकिन तब भी खुली जगहों के अलावा घर व दफ्तर आदि में धूल के कुछ कण वातारण में तैरते रहते हैं। जो नमी के साथ ही वायु मंडल में एक परत के रूप में जम जाते हैं। इससे लोगों के सीने में जलन, कफ जमने एवं इंफेक्शन की परेशानी हो सकती है।  

विटामिन, एंटीऑक्सीडेन्ट और पौष्टिक तत्वों से भरपूर ताजे फल और सब्जियों का रस अर्थराइटिस के लिए अद्भुत उपचार है। लहसुन, मौसमी, संतरा, गाजर और चुकंदर के रस का पर्याप्त सेवन इस रोग से निजात दिलाने में सहायक है। साथ ही फूल गोभी का रस पीते रहने से जोड़ों के दर्द में लाभ मिलता है।

कब्‍ज के कारण तमाम तरह की बीमारियां पैदा होती है। आयुर्वेदिक उपचार के माध्‍यम से आप कब्‍ज को दूर कर सकेंगे,सुबह-सुबह पेट साफ होने में किसी प्रकार की परेशानी भी नहीं होगी।

कब्‍ज एक ऐसी समस्‍या है जिससे ज्‍यादातर लोग परेशान रहते हैं। आयुर्वेद के अनुसार, इस प्रकार की समस्‍या वात, पित्‍त और कफ के बिगड़ने से होती है। जब भी कब्‍ज की समस्‍या होती है तो इसका सीधा असर मल पर पड़ता है। कब्‍ज की वजह से सुबह-सुबह ठीक तरह से मल का निष्‍कासन नहीं हो पाता है। यह आमतौर पर खराब जीवनशैली की वजह से होता है। खानपान में फाइबर की कमी और कम पानी पीने की वजह और एक्‍सरसाइज न करने और ज्‍यादा मीट का सेवन करने से ये समस्‍या ज्‍यादा देखने को मिलती है। कब्‍ज के कारण तमाम तरह की बीमारियां पैदा होती है। आज हम आपको इस लेख के माध्‍यम से 5 ऐसे आयुर्वेदिक उपचार के बारे में बताने जा रहे हैं जिसके माध्‍यम से आप कब्‍ज को दूर कर सकेंगे, साथ ही इससे आपको सुबह-सुबह पेट साफ होने में किसी प्रकार की परेशानी भी नहीं होगी।

वात दोष को शांत करने की डाइट

कब्‍ज का मुख्‍य कारण वात दोष होने के कारण इसे शांत करना बहुत जरूरी होता है। इसके लिए जरूरी है कि आप ठंडे आहार और पानी ये दूर रहें। इसके आलावा कुछ ड्राई फ्रूट, सलाद और बीन्‍स का भी सेवन नहीं करना चाहिए। हमेशा गर्म प्रकृति के आहार और हल्‍का गर्म पानी का सेवन करें और सब्जियों को अच्‍छी तरह से पकाकर खाएं।

त्रिफला है बेहतरीन उपचार

वात दोष में त्रिफला को सबसे विश्‍वसनीय और प्रभावी उपचार माना जाता है। ये फल कब्‍ज में बहुत लाभकारी होते हैं। आप त्रिफला चाय या फिर आप त्रिफला को एक चौथाई चम्‍मच, आधा चम्‍मच धनिया के बीच, एक चौथाई चम्‍मच इलायची के दाने को पीस लें और इसे दिन में दो बार लें। त्रिफला में ग्लाइकोसाइड होता है जिसमें रेचक गुण होते हैं। इलायची और धनिया के बीज पेट फूलना और अपमान से छुटकारा पाने में मदद करते हैं। 

 

डेंगू से बचना है, तो करें यह उपाय

खासतौर से जमे हुए पानी में पैदा होने वाले मच्छर से फैलने वाले डेंगू बुखार को हड्डी का बुखार भी कहा जाता है। इससे बचने के लिए कुछ सावधानियां रखना बेहद आवश्यक है। इसके अलावा अगर आप डेंगू की चपेट में आ गए हैं, तो क्या करें उपाय,

आइए जानते हैं -   

 

जमे हुए पानी में पैदा होने वाले मच्छर से फैलने वाले डेंगू बुखार को हड्डी का बुखार भी कहा जाता है। इससे बचने के लिए कुछ सावधानियां रखना बेहद आवश्यक है। इसके अलावा अगर आप डेंगू की चपेट में आ गए हैं, तो क्या करें उपाय, आइए जानते हैं - 

 

  •  अगर आप डेंगू बुखार की चपेट में आ गए हैं, तो जितना हो सके आराम करने पर ध्यान दें और शरीर में पानी की कमी न होने दें। समय समय पर पानी लगातार पीते रहें।  
  •  मच्छरों से बचाव करना बेहद आवश्यक है। इसके लिए सोते समय मच्छरदानी लगाकर सोएं और दिन में भी पूरी बांह के कपड़े पहनें, ताकि मच्छर न काट सके।
  •  घर में पानी का किसी प्रकार जमाव न होने दें। घर के आसपास भी कहीं जलजमाव न होने दें, ऐसा होने पर मच्छर तेजी से फैलेंगे।
  •   बुखार बढ़ने पर कुछ घंटों में पैरासिटामॉल लेकर, बुखार पर नियंत्रण रखें। किसी भी स्थिति में डिस्प्रि‍न या एस्प्रिन जैसी दवाईयां बिल्कुल न लें।   
  • जल चिकित्सा के माध्यम से भी शरीर का तापमान किया जा सकता है। इससे बुखार नियंत्रण में रहेगा।

 

सावधानी 

  •   डेंगू से बचाव के लिए जितना हो सके सावधानी रखें। इसके लिए हमेशा ध्यान रखें की पानी में गंदगी न होने पाए। लंबे समय तक किसी बर्तन में पानी भरकर न रखें। इससे मच्छर पनपने का खतरा रहता है।
  •   पानी को हमेशा ढंककर रखें, और हर दिन बदलते रहें, अन्यथा इसमें मच्छर आसानी से अपनी वंशवृद्ध‍ि कर सकते हैं।
  •  कूलर का पानी हर दिन बदलते रहें।  
  •  खि‍ड़की और दरवाजे पर मच्छर से बचने के लिए जाली लगाएं, जिससे मच्छर अंदर न आ सकें।
  •  पूरी बांह के कपड़े पहनें या फिर शरीर को जितना हो सके ढंक कर रखें। 

       इसके अलावा डेंगू के लक्षण सामने आने पर, या इस तरह की समस्याएं होने परअपने डॉक्टर से उचित परामर्श जरूर लें।  दवाईयों का सेवन भी चिकित्सकीय परामर्श के अनुसार ही करें।  

मलेरिया एक वाहक-जनित संक्रामक रोग है जो प्रोटोजोआ परजीवी द्वारा फैलता है। मलेरिया के परजीवी का वाहक मादा एनोफि‍लेज मच्छर है। इसके काटने पर मलेरिया के परजीवी लाल रक्त कोशिकाओं में प्रवेश कर बहुगुणित होते हैं जिससे एनीमिया के लक्षण जैसे  चक्कर आना, सांस फूलना, हृदय की धड़कन में असामान्य तेजी इत्यादि उभरने लगते हैं। इसके अलावा बुखार, सर्दी, उबकाई और जुकाम जैसी लक्षण भी देखने को मिलते हैं। गंभीर मामलों में मरीज मूर्च्छा में जा सकता है और मृत्यु भी हो सकती है। भारत में हर साल रोगों से होने वाली मौतों में लगभग 2.8 प्रतिशत लोग मलेरिया के शिकार बनते हैं। शोधों के अनुसार, देश की आबादी का लगभग 95 प्रतिशत लोग मलेरिया स्‍थानिक क्षेत्रों में रहते है। मलेरिया से बचाव के लिए अस्वास्थ्यकर स्‍थानों में रहते समय सावधानियां लेनी चाहिए और मच्‍छर को काटने से रोकने के लिए मच्‍छर भगाने वाले उपकरणों को उपयोग करना चाहिए।  

आत्महत्या 15-29 आयु वर्ग के भारतीयों में मौत का दूसरा सबसे आम कारण है। भारत में कुल मौतों में से लगभग 3.0 प्रतिशत मौतों को कारण आत्‍महत्‍या है। आत्महत्या अक्सर निराशा के चलते की जाती है, जिसके लिए अवसाद, द्विध्रुवीय विकार, शराब की लत या मादक दवाओं का सेवन जैसे मानसिक विकारों को जिम्मेदार ठहराया जाता है। तनाव के कारकों में वित्तीय कठिनाइयां या पारस्परिक संबंधों में परेशानियों जैसी समस्‍याओं की भी भूमिका होती है। रोकथाम के तरीकों में तनाव राहत उपचार, पुनर्वास और परामर्श शामिल हैं।

कैंसर एक ऐसी जानलेवा बीमारी, जिसकी चपेट में आकर हर साल हजारों लोग मौत की दहलीज पर खड़े होते हैं। भारत में लगभग 9.4 प्रतिशत लोग इस घातक ट्यूमर की चपेट में आते हैं। कैंसर ट्यूमर के विकास के कारणों में केमिकल और विषाक्त पदार्थों के संपर्क में आना और रोगजनक, जीन और विकिरण शामिल हैं। कैंसर को खतरे को कम करने के लिए तंबाकू के सेवन से बचना, स्‍वस्‍थ वजन और जीवन शैली को बनाए रखना, नियमित मेडिकल चेकअप और एंटीऑक्‍सीडेंट से भरपूर स्‍वस्‍थ आहार खाना बहुत महत्‍वपूर्ण होता है।

कैंसर के मरीज विश्वभर में तेजी से बढ़ रहे हैं। कैंसर लाइफ स्टाइल से जुड़ी बीमारी है यानि ये बीमारी इंसानों में उनके अनियमित रहन-सहन और गलत खान-पान की वजह से बढ़ रही है। मगर धीरे-धीरे ये बीमारी अनुवांशिक हो गई है यानि अब छोटे-छोटे बच्चे भी इस खतरनाक और जानलेवा बीमारी का तेजी से शिकार हो रहे हैं। भारत में कैंसर के जितने मरीज आते हैं उनमें से लगभग 5% मामले 15 साल से कम उम्र के बच्चों के होते हैं।


आजकल कैंसर ऐसी बीमारी बन गई है जो शरीर के किसी भी अंग को प्रभावित कर सकती है। इसी के आधार पर अलग-अलग सौ से ज्यादा तरह के कैंसर अब तक पहचाने गए हैं। मगर आपको बता दें कि बच्चों में होने वाले ज्यादातर कैंसर रोगी एक ही तरह की बीमारी का शिकार होते हैं और वो है ब्लड कैंसर। यानि दुनियाभर में और भारत में बच्चों में होने वाला ब्लड कैंसर या ल्यूकीमिया तेजी से बढ़ रहा है। बच्चों में इस बीमारी के लक्षण पहचानना थोड़ा मुश्किल है। आमतौर पर कैंसर जब किसी अंग में आधे से ज्यादा फैल चुका होता है, तब व्यक्ति को इसका पता चलता है।

 

क्या है ल्यूकीमिया या ब्लड कैंसर

 

ल्‍यूकीमिया एक तरह के ब्लड कैंसर की शुरुआती स्टेज है। इसका इलाज आसानी से किया जा सकता है मगर तभी जब इस रोग के शुरुआत में ही इसका पता चल जाए। अगर ठीक समय से इलाज न किया जाए तो ये एक खतरनाक और जानलेवा रोग है। ल्‍यूकीमिया की सही समय पर जांच और चिकित्सा आपको कैंसर से बचा सकती है।

ल्यूकीमिया या ब्लड कैंसर के लक्षण

बच्चों में ल्यूकीमिया यानि ब्लड कैंसर के लक्षणों को पहचानना थोड़ा मुश्किल है। लेकिन इन लक्षणों पर ध्यान देकर अगर आप तुरंत चिकित्सक से संपर्क करेंगे, तो शायद इस खतरनाक रोग से आप अपने बच्चों को बचा पाएंगे।

  1. बार-बार एक ही तरह का संक्रमण होना।
  2. बहुत तेज बुखार होना।
  3. रोगी का इम्यून सिस्टम कमजोर होना।
  4. हर समय थकान और कमजोरी महसूस करना।
  5. एनीमिया होना।
  6. नाक-मसूड़ों इत्यादि से खून बहने की शिकायत होना।
  7. प्लेटलेट्स का गिरना।
  8. शरीर के जोड़ों में दर्द होना।
  9. हड्डियों में दर्द की शिकायत होना।
  10. शरीर के विभिन्न हिस्सों में सूजन आना।
  11. शरीर में जगह-जगह गांठों के होने का महसूस होना।
  12. लीवर संबंधी समस्याएं होना।
  13. अकसर सिरदर्द की शिकायत होना। या फिर माइग्रेन की शिकायत होना।
  14. पक्षाघात यानी स्ट्रोक होना।
  15. दौरा पड़ना या किसी चीज के होने का बार-बार भ्रम होना। यानी कई बार रोगी मानसिक रूप से परेशान रहने लगता है।
  16. उल्टियां आने का अहसास होना या असमय उल्टियां होना।
  17. त्वचा में जगह-जगह रैशेज की शिकायत होना।
  18. ग्रंथियों/ग्लैंड्स का सूज जाना।
  19. अचानक से बिना कारणों के असामान्य रूप से वजन का कम होना।
  20. जबड़ों में सूजन आना या फिर रक्‍त का बहना।
  21. भूख ना लगने की समस्या होना।
  22. यदि चोट लगी है तो चोट का निशान पड़ जाना।
  23. किसी घाव या जख्म के भरने में अधिक समय लगना।

तेजी से फैलता है ल्यूकिमिया यानि ब्लड कैंसर

हालांकि ल्यूकीमिया के आरंभिक लक्षणों में फ्लू और दूसरी कई गंभीर बीमारियां होती हैं लेकिन जब ल्यूकीमिया अधिक बढ़ने लगता है तो उपरलिखित तमाम समस्याएं होने लगती हैं। कई बार इन समस्याओं को नजरअंदाज कर दिया जाता है तो ल्यूकीमिया कैंसर कोशिकाएं यानी ये ट्यूमर कोशिकाएं शरीर के अन्य भागों में भी फैल जाती हैं। जिससे शरीर में असामान्य रूप से सूजन आने लगती हैं और शरीर बहुत भद्दा दिखाई पड़ने लगता हैं। यदि आप सही समय पर ल्यूकीमिया के लक्षणों की पहचान कर पाते हैं और उसका उपचार करवा लेते हैं तो आप ल्यूकीमिया के जोखिम से बाहर निकल सकते हैं।

खतरनाक रोग है ल्यूकीमिया

ल्यूकीमिया सेल्स सीधे तौर पर रक्त को बहुत प्रभावित करते हैं। हालांकि ल्यू‍कीमिया के लक्षणों को आसानी से पहचाना जा सकता है, लेकिन जो लोग ल्यूकीमिया के लक्षणों को नजरअंदाज कर देते हैं और ल्यूकीमिया का समय पर इलाज नहीं करवाते उनका जीवन अधिकतम चार साल ही होता है। हालांकि यह भी मरीज की उम्र ,प्रतिरोधक क्षमता और ल्यूकीमिया के प्रकार पर निर्भर करता हैं। क्या  आप जानते हैं ल्यूकीमिया यानी रक्त कैंसर का इलाज ल्यूकीमिया के प्रकारों के आधार पर ही होता है।

 

घंटों एक ही जगह बैठ कर काम करना, जल्दी-जल्दी खाने के चक्कर में फास्ट फूड या जंक फूड खा लेना, बिगड़ी हुई दिनचर्या, कम शारीरिक श्रम करना, काम का तनाव और पूरी नींद नहीं लेना आज के लोगों की आदतों में शुमार हो गया है। इनकी वजह से अधिकांश लोगों का पाचन तंत्र ठीक से काम करना बंद कर देता है। इसके साथ ही डायरिया के प्रमुख कारणों में अस्वास्थ्यकर खाद्य पदार्थ, जीवाणु संक्रमण, दवा, स्टेरॉयड और सल्फा दवाओं का उपयोग शामिल है। डायरिया में उल्टियां और लूज मोशन होने से शरीर का पानी और नमक निकल जाते हैं। भारत में लगभग 5.1 प्रतिशत लोग हर साल पाचन विकार और लगभग 5.0 प्रतिशत लोग डायरिया का शिकार बनते हैं। स्‍वस्‍थ आहार और जीवनशैली के विकल्‍पों को बनाये रखकर इन समस्‍याओं को रोका जा सकता है।   

तपेदिक, क्षयरोग या टीबी एक आम और कई मामलों में घातक संक्रामक बीमारी है जो माइक्रो बैक्टीरिया, आमतौर पर माइको बैक्टीरियम टीबी के विभिन्न प्रकारों के कारण होती है। टीबी आम तौर पर फेफड़ों पर हमला करता है, लेकिन यह शरीर के अन्य भागों को भी प्रभावित कर सकता हैं। यह हवा के माध्यम से तब फैलता है, जब वे लोग जो सक्रिय टीबी संक्रमण से ग्रसित हैं, खांसी, छींक, या किसी अन्य प्रकार से हवा के माध्यम से अपना लार संचारित कर देते हैं। हर साल भारत में लगभग 10.1 प्रतिशत लोग इस जानलेवा बीमारी का शिकार बनते हैं। क्षय रोग को टीकाकरण, स्वस्थ आहार और जीवन शैली और नियमित रूप से निवारक परीक्षण से रोका जा सकता है।

सांस की बीमारियों के चलते भारत में हर साल लगभग 10.2 प्रतिशत लोग मौत के शिकार होते हैं। सांस की बीमारियों के मुख्‍य कारणों में वायु प्रदूषण, धूम्रपान, एस्बेस्टॉसिस, आदि शमिल है। व्यावसायिक खतरों से परहेज, स्‍वस्‍थ आहार अपनाना, शुद्ध हवा में सांस लेना और धूम्रपान छोड़ना, सांस की बीमारियों को रोकने के सबसे प्रभावी तरीके हैं। 

भारत देश में लगभग 24.8 प्रतिशत मौते हृदय रोग के कारण होती है। हालांकि यह परिहार्य है लेकिन दिल की बीमारी से मरने वाली की संख्‍या में हर साल इजाफा जारी है। जोखिम कारकों और सावधानियों की सही जानकारी के अभाव ने बीमारी और लोगों के बीच मौत की संभावना को बढ़ा दिया है। स्‍वास्‍थ्‍य मंत्रालय ने 2015 तक भारत में लगभग 60 लाख से अधिक लोगों में हृदय रोग होने की आंशका का अनुमान लगाया है। हृदय रोग के प्रमुख कारणों में तम्बाकू धूम्रपान, मोटापा, अस्वास्थ्यकर आहार, शारीरिक निष्क्रियता, उच्च कोलेस्ट्रॉल, हाई ब्लड प्रेशर और आनुवंशिकता शामिल हैं। दिल की बीमारी को स्वस्थ आहार, स्वस्थ वजन और गलत आदतों को छोड़कर रोका जा सकता है।   

दिल की बीमारियां खतरनाक होती हैं क्योंकि ये आपको संभलने का मौका नहीं देती हैं। इन जानलेवा बीमारियों की एक बड़ी वजह आपका गलत खान-पान और अनियमित जीवनशैली है। दिल की सबसे आम बीमारियों में ये बीमारियां हैं- हार्ट अटैक, धमनियों (आर्टरी) का संकरा (नैरो) हो जाना, हार्ट फेल्योर, दिल की धड़कन का अनियमित हो जाना, हार्ट वाल्व से जुड़ी बीमारी, कार्डियक अरेस्ट आदि। इनमें से कई बीमारियां जानलेवा हैं।
युवावस्था में हममें से ज्यादातर लोगों को कोई गंभीर बीमारी नहीं होती है। ऐसे में बहुत से लोग ये सोच लेते हैं कि वो स्वस्थ हैं और कभी बीमार नहीं होंगे। मगर 40 की उम्र आते-आते तरह-तरह की बीमारियां शरीर को घेरने लगती हैं। इसलिए दिल की बीमारियों का पता लगाने के लिए आपको कुछ जरूरी जांच करवा लेना चाहिए, ताकि समय रहते इन बीमारियों का पता चल सके और इलाज किया जा सके। आइये आपको बताते हैं कि दिल की बीमारियों के लिए कौन-कौन सी जांच हैं जरूरी।

 

कोलेस्ट्रॉल टेस्ट करवाएं

कॉलेस्ट्राल की जांच रिपोर्ट कॉलेस्ट्रॉल को मिलीग्राम प्रति डेसीलीटर (एमजी/डीएल) में दिखाती है। डॉक्टर कॉलेस्ट्रॉल स्तर को दूसरे रिस्क फैक्टर जैसे पारिवारिक इतिहास, स्मोकिंग और हाई बीपी आदि को भी ध्यान में रखते हुए आंकते हैं। यदि आपका कुल कॉलेस्ट्रॉल 200 एमजी/डीएल या इससे ज्यादा है या एचडीएल कॉलेस्ट्रॉल 40 एमजी/डीएल से कम है, तो आपके इलाज की लाइन तय करने के लिए आपके एलडीएल अर्थात बैड कॉलेस्ट्रॉल की जांच भी आवश्य हो जाती है। अगर आप पहला टेस्ट फास्टिंग में नहीं कराते हैं तो डॉक्टर आपको दोबारा कॉलेस्ट्रॉल टेस्ट कराने की सलाह दे सकता है।

सीने में उठे दर्द, तो कराएं ये जांच

ईकेजी का अर्थ होता है इलेक्ट्रोकार्डियोग्राम। इसे ईसीजी भी कहते हैं। ईकेजी कम समय में होने वाला, सुरक्षित, दर्दरहित व कम खर्च वाला टेस्ट होता है, जिसे हृदय की किसी समस्या की आशंका होने पर किया जाता है। इस टेस्ट में मरीज की छाती, भुजाओं और पैरों की त्वचा पर छोटे इलेक्ट्रोड पैच लगाकर इनकी मदद से हृदय की इलेक्ट्रिक एक्टिविटी को रिकॉर्ड किया जाता है। इसे जांच को एक नियमित स्वास्थ्य जांच की तरह किया जा सकता है और हृदय की बीमारी का पता लगाने के लिए भी। आमतौर पर ईकेजी का खर्च 150 से 200 रुपये तक आता है।

इस टेस्ट से पता चलती है शुरुआती बीमारी

ईसीजी/स्ट्रेस टीएमटी- इससे हृदय के संचालन में किसी गड़बड़ी के शुरुआती संकेत मिलते हैं और यह हृदय की देखभाल का प्रारंभिक टेस्ट होता है। जिसके बाद अन्य टेस्ट कराए जा सकते हैं। स्ट्रेस टीएमटी से शरीर को पहले थकाया जाता है और फिर ईसीजी लेकर देखा जाता है कि तनाव से हृदय की गतिविधि में कोई बदलाव तो नहीं आया है।

सीटी हार्ट स्कैन

कार्डिएक सीटी एक हार्ट-इमेजिंग टेस्ट होता है। इसे सीटी तकनीक से दिल की संरेचना, कोरोनरी सर्कुलेशन और रक्त नलिकाओं (इनमें एओट्रा, पल्मनरी वेंस और आर्टरी शामिल हैं) की स्थिति का पता लगाने के लिए किया जाता है।

कोरोनरी सीटी एंजियोग्राफी

कोरोनरी सीटी एंजियोग्राफी टेस्ट हाइस्पीड 128 स्लाइस सीटी स्कैनर रक्त प्रवाह में किसी प्रकार की रुकावट की पहचान के साथ धमनियों की दीवारों पर कैल्शियम जमा होने का पता लगाता है। इसमें कोई चीरा नहीं लगता और निदान की पूरी प्रक्रिया में 30 मिनट लगते हैं। वहीं पारंपरिक एंजियोग्राफी में एक डाई शरीर में डाली जाती है और कैथेटर भी लगाना पड़ सकता है।

ईकोकार्डियोग्राफी

ईकोकार्डियोग्राफी दिल के काम-काज को समझता है और उसके बारे में जरूरी जानकारी प्रदान करता है। इस जांच की मदद से पता लगाया जाता है कि हृदय की मांसपेशियों को कितना खून मिल रहा है। इसके लिए हृदय की डॉपलर इमेजिंग होती है।

जानिये क्यों होता है थायराइड रोग और कितनी महत्वपूर्ण है थाइराइड ग्रंथि

आजकल की बिजी लाइफ स्टाइल और अस्वस्थ खान-पान के कारण थायराइड के मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है। थायरायड को कुछ लोग साइलेंट किलर मानते हैं क्योंकि इसके लक्षण बहुत देर में पता चलते हैं। आमतौर पर महिलाएं इस रोग का ज्यादा शिकार होती हैं। थायरायड ग्रंथि गर्दन में श्वास नली के ऊपर, वोकल कॉर्ड के दोनों ओर दो भागों में बनी होती है। ये तितली के आकार की होती है। थायराइड ग्रंथि थाइराक्सिन नामक हार्मोन बनाती है। इस हार्मोन से शरीर की एनर्जी, प्रोटीन उत्पादन एवं अन्य हार्मोन्स के प्रति होने वाली संवेदनशीलता कंट्रोल होती है। ये ग्रंथि शरीर में मेटाबॉलिज्म की ग्रंथियों को भी कंट्रोल करती है।

थायराइड के लक्षण

थायराइड की वजह से शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है इसलिए इसकी वजह से शरीर में कई अन्य समस्याएं शुरू हो जाती हैं। थायराइड के सामान्य लक्षणों में जल्दी थकान, शरीर सुस्त रहना, थोड़ा काम करते ही एनर्जी खत्म हो जाना, डिप्रेशन में रहने लगना, किसी भी काम में मन न लगना, याद्दाश्त कमजोर होना और मांसपेशियों और जोड़ों में दर्द होना शामिल हैं। इन सभी समस्याओं को आम समझकर ज्यादातर लोग इग्नोर करते रहते हैं जो बाद में खतरनाक साबित हो सकता है और कई बार तो जानलेवा साबित हो सकता है।

थायराइड ग्रंथि क्या है

थायराइड कोई रोग नहीं बल्कि एक ग्रंथि का नाम है जिसकी वजह से ये रोग होता है। लेकिन आम भाषा में लोग इस समस्या को भी थायराइड ही कहते हैं। दरअसल थायराइड गर्दन के निचले हिस्से में पाई जाने वाली एक इंडोक्राइन ग्रंथि है। ये ग्रंथि एडमस एप्पल के ठीक नीचे होती है। थायराइड ग्रंथि का नियंत्रण पिट्यूटरी ग्लैंड से होता है जबकि पिट्यूटरी ग्लैंड को हाइपोथेलमस कंट्रोल करता है। थायराइड ग्रंथि का काम थायरॉक्सिन हार्मोन बनाकर खून तक पहुंचाना है जिससे शरीर का मेटाबॉलिज्म नियंत्रित रहे। ये ग्रंथि दो प्रकार के हार्मोन बनाती है। एक टी3 जिसे ट्राई-आयोडो-थायरोनिन कहते हैं और दूसरी टी4 जिसे थायरॉक्सिन कहते हैं। जब थायराइज से निकलने वाले ये दोनों हार्मोन असंतुलित होते हैं तो थायराइड की समस्या हो जाती है।

कैसे होती है जांच

किसी शारीरिक समस्या के लिए जब आप डॉक्टर के पास जाते हैं तो सबसे पहले वो इसके लक्षणों द्वारा रोग की पहचान करता है। अगर डॉक्टर को थायराइड की संभावना समझ आती है, तो वो खून में टी3, टी4 और टीएसएच हार्मोन की जांच करता है। इसके अलावा अल्ट्रासाउंड के द्वारा थायराइड और एंटी थायराइड टेस्ट होता है। असल में थायरायड ग्रंथि में कोई रोग या वायरस नहीं होता है। शरीर में जब पिट्युटरी ग्लैंड ठीक तरह से काम नहीं करता तो थायरायड स्टिमुलेटिंग हार्मोन (टीएसएच) यानि थायरायड ग्रंथि को उत्तेजित करने वाला हार्मोन ठीक तरह से नहीं बन पाता और इसकी वजह से थायराइड से बनने वाले टी3 और टी 4 हार्मोन्स में असंतुलन आ जाता है।

बच्चे भी हो रहे हैं शिकार

आजकल थायराइड जैसी गंभीर बीमारी का शिकार कम उम्र के बच्चे भी हो रहे हैं जिसकी वजह से उनका शारीरिक और मानसिक विकास रुक जाता है। इससे बचाव के लिए बच्चों को बचपन से ही नियमित व्यायाम, योग और प्रणायाम की आदत डालें। सिर्फ पढ़ते रहने, टीवी देखने, गेम खेलने या लेटे रहने के बजाय बच्चों को बाहर निकलने और थोड़ा खेलने के लिए प्रेरित करें। अगर बच्चा बचपन से शारीरिक मेहनत नहीं करेगा तो आगे चलकर उसे थायराइड, डाइबिटीज, ओबेसिटी, बल्ड प्रेशर जैसी गंभीर बीमारियों का शिकार बनना पड़ सकता है।

कई बार ऐसा होता है कि बिस्‍तर से उठने पर हमें तेज बुखार या फिर शरीर के किसी हिस्‍से में तेज दर्द जैसी समस्‍या सताने लगती है। आमतौर पर हम इस समस्‍या को नजरअंदाज कर देते हैं। लेकिन, इस प्रकार की समस्‍या अगर नियमित रूप से आपको सताने लगे, तो फिर मामला गम्‍भीर है।

 

आधुनिक जीवनशैली ने हमें ऐशो-आराम के तमाम सामानों के साथ बीमारियां भी दी हैं। इसके लिए कई शारीरिक समस्‍यायें आए दिन हमें परेशान करती रहती हैं। हालांकि, कई तकलीफ अस्‍थायी होती हैं, जो कुछ समय बाद अपने आप ही ठीक हो जाती हैं। इस तरह के लक्षणों को हम आमतौर पर नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन यह ठीक नहीं। हो सकता है कि ये लक्षण आपको आज मामूली लग रहे हों, लेकिन ये किसी खतरनाक बीमारी के संकेत भी हो सकते हैं।

 

अगर अचानक कोई स्‍वास्‍थ्‍य संबंधी समस्‍या आपको सताने लगे, तो इसे गंभीरता से लेते हुए अपने चिकित्‍सक से संपर्क करें। आपको इस तरह की समस्‍या थकान होने पर भी हो सकती है। इस लेख के जरिए हम आपको बता रहे हैं ऐसी शारीरिक समस्‍याओं के बारे में जिन्‍हें नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। 

अचानक सिर दर्द होना

ऑफिस में काम करने के दौरान, सुबह उठने के बाद या किसी और समय अचानक सिर दर्द होता है तो यह सामान्‍य कारण नहीं है। अमूमन देखा जाता है कि इस तरह का दर्द सिर के किसी एक हिस्‍से में अचानक और कुछ सेकेंड या मिनटों के लिए होता है। कुछ समय बाद दर्द बिना उपचार के ही ठीक हो जाता है, ठीक होने पर हम इस पर ध्‍यान नहीं देते। ऐसा होने पर चिकित्‍सक से परामर्श करें। यह दर्द माइग्रेन का भी हो सकता है और आंखों में तकलीफ का भी। बिना डॉक्‍टरी जांच इसकी असल वजह का पता लगाना मुश्किल है। 

सीने में दर्द

कई बार लोग अचानक सीने में होने वाले दर्द को स्‍वास्‍थ्‍य समस्‍या न मानकर नरजअंदाज कर देते हैं। यदि दर्द के कारण आप सही से काम नहीं कर पाते, दबाव महसूस करते हैं या आपको बैठने में समस्‍या होती है तो यह हार्ट अटैक का कारण भी बन सकता है। सीने में दर्द होने पर मितली आने, उल्‍टी होने और छोटी सांस आने की समस्‍या भी हो सकती है। काम के दौरान सीने में दर्द की परेशानी ऐन्‍जाइना के कारण हो सकती है। इसमें हृदय की नसों को पर्याप्‍त मात्रा में रक्‍त नहीं मिल पाता। 

तेजी से वजन घटना

शरीर का तेजी से वजन घटना अच्‍छा नहीं। यदि आप वजन घटाने की कोशिश नहीं करते और आपका 5 फीसदी वजन अचानक कम हो जाता है तो यह कैंसर हो सकता है। उम्रदराज व्‍यक्तियों में अचानक वजन कम होने के 36 फीसदी मामलों की पुष्टि कैंसर के रूप में हुई है। इस तरह की परेशानी होने पर चिकित्‍सक से संपर्क करना चाहिए। यदि वजन कम होने के साथ ही आपको ज्‍यादा प्‍यास, भूख, थकान और ज्‍यादा मूत्र आने की भी समस्‍या है तो यह डायबिटीज का संकेत हो सकता है। 

तेज बुखार या लगातार बुखार रहना

किसी को लंबे समय से बुखार है या 103 डिग्री फॉरहनहाइट या इससे अधिक बुखार है तो यह खतरनाक हो सकता है। ऐसा होने पर रोगी को मूत्राशय संबंधी संक्रमण, निमोनिया और मस्तिष्‍क ज्‍वर आदि की समस्‍या हो सकती है। लंबे समय तक बुखार रहने पर एंटीबॉयोटिक का सेवन किया जाता है। लगातार कई हफ्तों तक हल्‍का बुखार रहना किसी बड़ी बीमारी का कारण अथवा इशारा हो सकता है। इस प्रकार की समस्‍या को अनदेखा न करें और उचित उपचार कराएं। 

 

छोटी सांस आना

 

अचानक छोटी सांस आना फेफड़ों संबंधी समस्‍या हो सकती है। यदि आपको सीढ़ी चढ़ने पर सांस लेने में परेशानी होती है या आप खुद को थका हुआ महसूस करते हैं तो इसे मामूली न मानें। यह दिल की धड़कन अनियमित होने का इशारा हो सकती है। यह हार्ट फेल होने या फिर अन्‍य प्रकार की हृदय संबंधी बीमारियों का कारण बन सकती है। इसके अलावा ऐसा अस्‍थमा के कारण भी हो सकता है। 

टांगों में सूजन

तरल पदार्थों का संचयन होने पर टांगों में सूजन की समस्‍या होती है। चिकित्‍सक इसे हार्ट फेल होने का लक्षण भी मानते हैं। जितनी मात्रा में शरीर को खून की जरूरत होती है, जब हृदय उस मात्रा में खून का संचार नहीं कर पाता और रक्‍त नसों में वापस जाने लगता है परिणामस्‍वरूप टांगों में सूजन आ जाती है। टांगों में लंबे समय तक सूजन रहने पर चिकित्‍सक से संपर्क करना जरूरी हो जाता है।

 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शरीर को इंडिया को फिट रखने के लिए अलग-अलग योग और ध्‍यान मुद्राओं से सोशल मीडिया के माध्‍यम से लोगों को जागरूक कर रहे हैं। आगामी 21 जून को चौथा अंतर्राष्‍ट्रीय योग दिवस मनाया जाएगा। जिसको ध्‍यान में रखते हुए पीएम लगातार अपने ट्विटर अकाउंट पर विभिन्‍न प्रकार के योगासन के वीडियो एनिमेशन प्रारूप में लोगों के साथ साझा कर रहे हैं। इस श्रंखला को आगे बढ़ाते हुए उन्‍होंने सोमवार को ध्‍यान मुद्रा के बारे में बताया है। ध्‍यान क्‍या है और कैसे किया जाता है? ये सब आप उनके इस वीडियो में सीख सकते हैं। इसके अलावा ध्‍यान मुद्रा के फायदों के बारे में भी बताया गया है।

ध्‍यान क्‍या है

ध्‍यान या मेडिटेशन सतत चिंतन की एक कला है। ध्‍यान में मुख्‍य रूप से तीन बातों का समावेश है। 1- बाहरी वस्‍तुओं और आंतरिक अवस्‍थाओं से अनभिज्ञ हो जाना। 2- उस वस्‍तु पर निरंतर जागरूकता, जिस पर ध्‍यान केंद्रित किया गया है। 3- दूसरे मानसिक परिवर्तनों पर सहज रोग या प्रभावित न होना। ध्‍यान आपको शांति और आंतरिक सद्भाव खोजने में मदद करता है।

ध्‍यान कैसे करें

  • ध्‍यान करने के लिए इसका तरीका आपको पता होना चाहिए। सही तरीके से किया गया ध्‍यान आपको सही परिणाम देगा।
  • इसे करने के लिए सबसे पहले आप पद्मासन में बैठ जाएं जोकि एक ध्‍यानात्‍मक आसन है। इसके अलावा आप ध्‍यान सुखासन या वज्रासन में भी बैठकर कर सकते हैं।
  • जो लोग जमीन पर बैठने में असमर्थ हैं वह कुर्सी पर बैठकर कर अभ्‍यास कर सकते हैं।   
  • पद्मासन में बैठन के दौरान यह सुनिश्चित करें कि आपका पॉश्‍चर बिल्‍कुल सही होना चाहिए। यानी आपका मेरूदण्‍ड बिल्‍कुल सीधा होना चाहिए। अपने मेरूदण्‍ड को सीधा रखने में आप दीवार का सहारा ले सकते हैं। जैसा कि आप वीडियो में देख सकते हैं।
  • भुजाएं, कंधे ढीले हों और सिर हल्‍का सा ऊंचा और आंखे बंद हों।
  • अब अपने हाथों को ध्‍यान मुद्रा में लाने के लिए सुनिश्चित करें कि आपकी उंगलियां आपस में जुड़ी हुई हों।
  • अब अपनी बांयी हथेली को पेट के पास लाते हुए अपनी बांयी टांग पर रखें और दांयी हथेली को बांयी हथेली के ऊपर रखें। ये ध्‍यान मुद्रा है।

ध्‍यान के दौरान क्‍या करें

  • सुनिश्चित करें कि आपका पूरा शरीर तनाव मुक्‍त यानी आरामदायक स्थिति में हो। सिर से लेकर पांव तक अपने शरीर के प्रति जागरूकता बनाएं। यह आपका ध्‍यान बाहरी वस्‍तुओं और विकृति से दूर करेगा और अंदर की ओर आकर्षित करेगा।
  • अब आप सांस लेने और छोड़ने की प्रक्रिया की ओर जागरूकता बनाएं। अपनी सांसे धीमी और गहरी रखें। इस प्रक्रिया को तब तक जारी रखें जब तक कि आपकी सांसे कम न हो जाएं।
  • बिना किसी वस्‍तु पर विशेष ध्‍यान रखते हुए सिर्फ अपनी भौहों पर हल्‍का सा ध्‍यान दें। और अपनी आती जाती सांसों को महसूस करें।
  • अब अपना मन अपने विचारों की ओर ले जाएं और  पवित्र और निर्मल विचारों के साथ रहने का प्रयास करें।
  • जैसे ही आप ध्‍यान में लीन हो जाएंगे आपका मन शांत हो जाएगा। आपकी मानसिक गतिविधि कम हो जाएगी। आपके विचार खत्‍म हो जाएंगे। आप पूरी तरह से चिंता और तनाव से मुक्‍त होकर आराम महसूस करेंगे। ध्‍यान योगाभ्‍यास का सबसे महत्‍वपूर्ण और अभिन्‍न अंग है। इसलिए इस स्थिति में सामान्‍य स्थिति में सांस लेते और छोड़ते हुए जितने समय तक संभव हो उतने समय तक बैठे रहें।

ध्‍यान करने के फायदे

  • ध्‍यान आपके शरीर और मस्तिष्‍क को नवजीवन प्रदान करता है।
  • ध्‍यान आपको नकारात्‍मक विचारों से दूर रखता है।
  • यह क्रोध, भय और चिंता, अवसाद से दूर रखते है।
  • ध्‍यान आपके जीवन की गुणवत्‍ता में सुधार लाता है।
  • आपकी एकाग्रता बढ़ाने में मदद करता है।
  • सकारात्‍कमक विचार और भावनाएं विकसित करता है।
  • यह आपको अधिक उत्‍पादक बनने में सफल बनाता है।
  • नियमित रूप से ध्‍यान का अभ्‍यास करने से आप अपने जीवन में परिवर्तन देख पाएंगे।