• नगरपालिकाबोर्ड द्वारा शहर के सौन्दर्य को बढ़ावा देने के लिए किए जा रहे कार्यों में 56 लाख के कार्य और जुड़ गए हैं। नगरपालिका द्वारा शहर की सीमा पर जयपुर एवं पाली की तरफ विशाल एवं भव्य प्रवेश द्वारों का निर्माण करवाया जाएगा। पालिकाध्यक्ष श्री दिनेश कुमार मीणा ने बताया कि शहर में चारों ओर सौन्दर्यकरण का कार्य चल रहा है। नगरपालिका सीमा में पाली एवं जयपुर की तरफ से प्रवेश सीमा पर 26 -26 लाख की लागत से दो प्रवेश द्वारों का निर्माण करवाया जाएगा।

जैविक खादों का मृदा उर्वरता और फसल उत्पादन में महत्व

●     जैविक खादों के प्रयोग से मृदा का जैविक स्तर बढ़ता है, जिससे लाभकारी जीवाणुओं की संख्या बढ़ जाती है और मृदा काफी
उपजाऊ बनी रहती है ।  
●   जैविक खाद पौधों की वृद्धि के लिए आवश्यक खनिज पदार्थ प्रदान कराते हैं, जो मृदा में मौजूद सूक्ष्म जीवों के द्वारा पौधों को 
मिलते हैं जिससे पौधों स्वस्थ बनते हैं और उत्पादन बढ़ता है ।
●  रासायनिक खादों के मुकाबले जैविक खाद सस्ते, टिकाऊ तथा बनाने में आसान होते हैं । इनके प्रयोग से मृदा में ह्यूमस की 
बढ़ोतरी होती है व मृदा की भौतिक दशा में सुधार होता है ।
● पौध वृद्धि के लिए आवश्यक पोषक तत्वों जैसे नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश तथा काफी मात्रा में गौण पोषक तत्वों की पूर्ति 
जैविक खादों के प्रयोग से ही हो जाती है ।
●  कीटों, बीमारियों तथा खरपतवारों का नियंत्रण काफी हद तक फसल चक्र, कीटों के प्राकृतिक शत्रुओं, प्रतिरोध किस्मों और जैव उत्पादों द्वारा ही कर लिया जाता है ।
● जैविक खादें सड़ने पर कार्बनिक अम्ल देती हैं जो भूमि के अघुलनशील तत्वों को घुलनशील अवस्था में परिवर्तित कर देती हैं, जिससे मदा का पी-एच मान 7 से कम हो जाता है । अतः इससे सूक्ष्म पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ जाती है । यह तत्व फसल उत्पादन में आवश्यक है ।
●  इन खादों के प्रयोग से पोषक तत्व पौधों को काफी समय तक मिलते हैं । यह खादें अपना अवशिष्ट गुण मृदा में छोड़ती हैं । अतः यह एक फसल में इन खादों के प्रयोग से दूसरी फसल को लाभ मिलता है । इससे मृदा उर्वरता का संतुलन ठीक रहता है ।
 
                                "जैव उर्वरकों से लाभ"
 ● 300 रूपये के यूरिया से जितना लाभ मिलता है उतना ही लाभ मात्र 70 रुपये खर्च करके जैब उर्वरकों से प्राप्त किया जा सकता है
 ● इनके प्रयोग से बीजों का अंकुरण शीघ्र एवं जड़ों का विकास अच्छा होता है ।
 ● जैव उर्वरक पौधों की वृद्धि में सहायक पोषक तत्वों, विटामिन्स व हारमोन्स आदि भी प्रदान करते हैं ।
 ● मृदा में लाभदायक जीवाणु की संख्या में वृद्धि एवं भूमि की संरचना में सुधार कर उपजाऊ शक्ति को बढ़ाते हैं ।
 ● इनके प्रयोग से रासायनिक उर्वरकों की बचत होती है तथा फसल उत्पादन बढ़ता है साथ ही आर्थिक लाभ भी अधिक मिलता है ।
● जैव उर्वरक उपचारित अन्न, सब्जी, फलों आदि उत्पादों का स्वाद रासायनिक उर्वरक की तुलना में प्राकृतिक रूप से उत्तम होता है
● जैव उर्वरक उपचारित पौधों में रोगों से लड़ने की शक्ति अधिक होती है ।
● सभी जैव उर्वरक पर्यावरण के मित्र हैं । इनके अधिक प्रयोग से किसी प्रकार की हानि नहीं होती है ।
 
                        "जैव उर्वरकों के प्रयोग में सावधानियां एवं सुझाव"
 ● कल्चर का प्रयोग पैकेट में छपी प्रयोग की अंतिम तिथि से पूर्व करें ।
 ● कल्चर पैकेटों का भंडारण ठंडी एवं सुरक्षित जगह पर करें तथा उन्हें सूर्य की सीधी रोशनी से बचायें ।
 ● फफूंदनाशक, कीटनाशक तथा रासायनिक उर्वरकों के साथ न तो इसका भंडारण करें और न उनके साथ मिलाकर प्रयोग करें ।
 ● राइजोबियम जैव उर्वरक का प्रयोग पैकेट पर लिखी विशिष्ट फसल में ही करें ।
 ● जैव उर्वरकों के घोल का बीजों पर लेप करते समय उनके छिलकों को नुकसान न हो ।
 ● फफूंदनाशक तथा कीटनाशक दवाओं के प्रयोग के साथ जैव उर्वरकों की दो गुनी मात्रा का प्रयोग करें ।
भारत की अर्थव्यवस्था का एक बड़ा भाग कृषि उत्पादन पर निर्भर करती है । यह एक दुखद पहलू है कि हमारे यहां कुछ वर्षो से अधिकाधिक उत्पादन प्राप्त करने के लिए रासायनिक उर्वकों का अंधाधुंध व अनियंत्रित प्रयोग किया जा रहा है, जिसके कारण मृदा स्वास्थ्य और मृदा में उपलब्ध लाभदायक जीवाणुओं की संख्या में भारी ह्रास हुआ है । रासायनिक उर्वरकों के अत्याधिक प्रयोग से भूमि की उपजाऊ शक्ति में कमी तो आई ही है, साथ ही उसके अन्य दुष्प्रभाव जैसे मृदा, जल तथा पर्यावरण प्रदूषण आदि भी सामने आने प्रांरभ हो गये हैं । मृदा को स्वस्थ बनाए रखने, लक्षित उत्पादन प्राप्त करने के लिए, उत्पादन लागत कम करने हेतु व पर्यावरण और स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से यह आवश्यक है कि रासायनिक उर्वरकों जैसे कीमती निवेश के प्रयोग को एक हद तक कम करके जैविक खादों के प्रयोग को बढ़ावा दिया जाना चाहिए । 
 
जैविक खादों में फार्म यार्ड खाद, कम्पोस्ट, हरी खाद, वर्मी कम्पोस्ट, नैडप की खाद इसके अलावा मूंगफली, केक, मछली की खाद, महुआ केक इत्यादि प्रमुख रूप से हैं ।
 
वर्मी कम्पोस्ट
वर्मी कम्पोस्ट में महत्वपूर्ण भूमिका केंचुओं की होती है । एक विशेष प्रकार के केंचुए की प्रजाति के द्वारा कार्बनिक / जीवांश पदार्थो को विघटित करके /  सड़ाकर यह खाद तैयार की जाती है । जिसे वर्मी कम्पोस्ट खाद कहते हैं ।
वर्मी कम्पोस्ट बनाने की विधि
छायाकार ऊंचे स्थान पर जमीन की सतह से थोड़ा ऊपर मिट्टी डालकर 2 मी.× 2 मी. ×1 मी. क्रमशः लंबाई, चौड़ाई और गहराई का आवश्यकतानुसार गड्ढा बना लें तथा गड्ढे में सबसे नीचे ईट या पत्थर की 11 सें.मी. परत बनाइए फिर 20 सें.मी. मौरंग या बालू की दूसरी सतह लगाइये । इसके ऊपर 15 सें.मी. मिट्टी की ऊंची तह लगाकर पानी का हलका छिड़काव करके मिट्टी को नम बनायें । इसके बाद सड़ा गोबर डालकर एक कि.ग्रा. प्रति गड्ढे की दर से केंचुए छोड़ दें फिर इसके ऊपर 5 से 10 सें.मी. घरेलू कचरा जैसे- फल व सब्जियों के छिलके, पुआव, भूसा, मक्का व जल कुंभी, पेड़ की पत्तियां आदि को बिछा दें । 20 दिन तक आवश्यकतानुसार पानी का छिड़काव करते रहें । इसके बाद प्रति सप्ताह दो बार 5-10 सें.मी. सड़ने योग्य कूड़े कचरे की तह लगाते रहें, जब तक कि सारा गड्ढा भर न जायें । प्रत्येक दिन पानी का छिड़काव करते रहना चाहिए । 5-7 सप्ताह बाद वर्मी कम्पोस्ट बनकर तैयार हो जाती है । उसके बाद खाद निकाल कर छाया में ढेर लगाकर सुखा दें ।
कम्पोस्ट खाद 
कम्पोस्ट खाद उस खाद को कहते हैं जिसमें फसलों के अवशेष, घास इत्यादि को जानवर से प्राप्त कचरा व गोबर को एक साथ एक निर्धारित गड्ढे में सड़ाकर बनाई जाती है । इसके लिए 10 फिट × 5  फिट × 4 फिट लंबाई, चौड़ाई व गहराई का गड्ढा बनाकर उसकी चुनाई अंदर से ईट द्वारा कर दी जाती है । इसके बाद फसलों के अवशेष, सड़ा भूसा, पुआल व घास एवं पशुओं से प्राप्त गोबर को एक के बाद एक तल के रूप में लगाकर गड्ढा भर लिया जाता है । गड्ढा भर जाने के बाद मिट्टी से ढक दिया जाता है । इस प्रकार ६ माह में खाद सड़कर तैयार हो जाती है ।
हरी खाद की फसलों की उत्पादन क्षमता 
हरी खाद की विभिन्न फसलों की उत्पादन क्षमता जलवायु, फसल वृद्धि तथा कृषि क्रियाओं पर निर्भर करती है । 
== हरी खाद़ ==
इसमें ढैंचा, सनई, उड़द, मूंग इत्यादि के पौधों को हरी अवस्था में खेत में पलटकर सड़ा दिया जाता है, जिससे मृदा को जैविक खाद प्राप्त होती है । खरीफ मौसम शुरू होने पर खेत में पलेवा करके ढैंचा व सनई की बुआई करनी चाहिए । ध्यान रहे बुआई करते समय यदि खेत की उर्वरा शक्ति कम हो तो रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग करना चाहिए तथा फसल जमाव के बाद कम नमी की अवस्था में सिंचाई करते रहना चाहिए । बुआई के लिए ढैंचा 60-70 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर तथा सनई 60 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर बीज का प्रयोग करना चाहिए । जब फसल बुआई के 40-50 दिन के अवस्था की हो जाये उस समय पाटा लगाकर फसल को गिराकर मिट्टी पलटने वाले हल से जुताई करके मिट्टी में मिला देना चाहिए । यदि ट्रैक्टर से पलटाई करनी है तो हैरो से जुताई करके सनई, ढैंचे को सड़ाकर मिला चाहिए ।
 
फर्म यार्ड खाद 
पालतू जानवरों द्वारा प्राप्त गोबर, मल-मूत्र से तैयार खाद को फार्म यार्ड या घूरे की खाद कहते हैं । कृषकों द्वारा जानवरों से प्राप्त गोबर व मल-मूत्र का ठीक ढंग से न सड़ने के कारण खाद काफी खराब होकर सूख जाती है जिससे तत्वों की मात्रा काफी कम हो जाती है । ऐसी स्थिति में पूर्व में निर्धारित तथा गहरे गड्ढे से प्राप्त गोबर कचरा और मूत्र इत्यादि को एक तह के रूप में गड्ढे में डालना चाहिए । जब एक तह लग जाये तो उसके बाद मिट्टी की हल्की परत से ढक देना चाहिए । इसके बाद दूसरी तह गोबर की डालनी चाहिए । इस प्रकार गड्ढा भर जाने पर हल्की मिट्टी से ढक देना चाहिए । गड्ढे में कम नमी के अवस्था में पानी का छिड़काव अवश्य करना चाहिए, जिससे गोबर सड़ने में आसानी रहे । इस प्रकार यह खाद तैयार हो जाने के बाद फसल बुआई के पूर्व खेत तैयार करते समय फसल के अनुसार मिट्टी में मिला देना चाहिए ।
 
 खली की खाद
 महुआ, नीम, मूंगफली, तिल इत्यादि से तेल निकालने के बाद जो अवशेष प्राप्त होता है उसको खली कहते हैं । इसका प्रयोग फसलों में करने से काफी मात्रा में तत्वों के प्राप्त होने के साथ ही साथ मृदा में पनपने वाले हानिकारक कीटाणुओं को नष्ट करते हैं । फसल की आवश्यकतानुसार इनका प्रयोग करना चाहिए ।
 
'हरी खाद की फसलों की उत्पादन क्षमता'

 सनई            20-30                        0.43                86-129
ढैंचा            20-25                        0.42                84-105
उड़द            10-12                        0.41                41-49
मूंग            8-10                        0.48                38-39
ग्वार            20-25                        0.34                68-85
लोबिया            15-18                        0.49                74-88
कुल्थी            8-10                        0.33                26-33

== जीवाणु खाद ==
 जीवाणु खाद मृदा में मौजूद लाभकारी सूक्ष्म जीवों का वैज्ञानिक तरीकों से चुनाव कर अनुसंधान प्रयोगशालाओं में तैयारी की जाती है । ये जीवाणु फसलों की पोषक तत्वों की जरूरत को पूरा कर उनकी वृद्धि बढ़ाकर उत्पादन बढ़ाते हैं । साथ ही मृदा में मौजूद फास्फोरस को घुलनशील बनाकर पौधों को उपलब्ध कराते हैं । तो वहीं कुछ मात्रा में गौण तत्वों जैसे-जिंक, तांबा, सल्फर, लोहा, बोरान, कोबाल्ट व मोलिबिडिनम इत्यादि पौधों को प्रदान कराते हैं । पाया गया है कि यह पादप वृद्धि करने वाले हारमोन्स, प्रोटीन, विटामिन एवं अमीनों अम्ल का उत्पादन करते हैं । साथ ही मृदा में पनप रही रोग जनक फफूंदी नष्ट कर लाभकारी जीवाणुओं की संख्या बढ़ाते हैं । यह सूक्ष्म जीवाणु खेती में बचे हुए कार्बनिक अपशिष्टों को सड़ाकर मृदा में कार्बनिक अपशिष्टों को सड़ाकर मृदा में कार्बनिक यौगिक की उचित मात्रा बनाए रखते हैं । इनके प्रयोग से मृदा की जल धारण शक्ति, बफर शक्ति व उर्वराशक्ति बढ़ती है जिससे फसलोत्पादन बढ़ता है । प्रत्येक मौसम में प्रति फसल लगभग 20-30 कि.ग्रा. नाइट्रोजन प्रति हैक्टर का उत्पादन करते हैं तथा फास्फोरस को घुलनशील बनाने वाले जीवाणु प्रति हैक्टर लगभग 30-40 कि.ग्रा. फास्फोरस प्रति फसल उपलब्ध कराते हैं । इन जीवाणुओं के प्रयोग से लगभग 15-30 प्रतिशत फसलोत्पादन बढ़ता है और उत्पाद की गुणवत्ता बहुत अच्छी रहती है ।
जीवाण खाद में मौजूद जीवाणुओं की शुद्धता एवं उनकी एक निश्चित मात्रा ही उसकी सफलता का माप दंड है । अतः किसानों को सलाह दी जाती है कि वे जीवाणु खाद कृषि अनुसंधान संस्थानों, कृषि विज्ञान केंद्रों, कृषि विश्वविद्यालयों एवं सरकार द्वारा स्थापित कृषि केंद्रों से ही खरीदें । लगातार किये गये प्रयोगों के आधार पर इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि गेहूं की फसल के लिये 10 टन प्रति हैक्टर गोबर की खाद के साथ ऐजोटोबेक्टर व ऐजोस्पिरिलम जीवाणु को मिलाकर प्रयोग करने से लगभग उतना ही उत्पादन होता है जितना 80 कि.ग्रा. नाइट्रोजन प्रति हैक्टर प्रयोग करने से होता है ।
 
== जैव उर्वरक ==
 ऐसे जीवित सूक्ष्म जीवाणुओं का कोयला, पीट अथवा लिग्नाइट के चूर्ण में मिश्रण है पीट अथवा लिग्नाइट के चूर्ण में मिश्रण है जो कि वायुमंडल में उपस्थित नाइट्रोजन को अवशोषित कर भूमि में स्थापित करते हैं तथा अघुलनशील मृदा फास्फेट तथा अन्य तत्वों को घुलनशील कर पौधों को उपल्बध कराते हैं ।
 
== जैव उर्वरकों के प्रकार ==
'''राइजोबियम कल्चर-''' यह एक नम चारकोल व जीवाणु का मिश्रण है जिसके प्रति एक-एक भाग में 10 करोड़ से अधिक राइजोबियम जीवाणु होते हैं । यह खाद केवल दलहनी फसलों में दिया जाता है । रोइजोबियम खाद में बीज उपचार करने पर यह बीज के साथ चिपक जाता है । बीज अंकुरण पर यह जीवाणु जड़ की मूल रोम द्वारा पौधों की जड़ों में प्रवेश कर जड़ों पर ग्रंथियों का निर्माण करते हैं । पौधों की जड़ों से अधिक ग्रंथियों के होने पर फसल की पैदावार बढ़ती है । इसके प्रयोग से 10-15 कि.ग्रा. नाइट्रोजन की बचत होती है तथा फसल उपज में 10-15 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी पायी गयी है । अलग-अलग दलहनी फसल के लिए अलग-अलग राइजोबियम कल्चर बाजार में उपलब्ध होते हैं ।
'''एजेटोबैक्टर-''' यह जीवाणु पौधों की जड़ क्षेत्र में स्वतंत्र रूप से रहने वाले जीवाणुओं का एक नम चूर्ण रूप उत्पाद है, जो वायुमंडल की नाइट्रोजन का स्थिरीकरण करके पौधों को उपलब्ध कराते हैं । इसके एक ग्राम में लगभग 10 करोड़ जीवाणु होते हैं । यह जीवाणु खाद दलहनी फसल को छोड़कर सभी फसलों में उपयोग की जा सकती है । इसके प्रयोग से 20-30 कि.ग्रा. नाइट्रोजन की बचत होती है तथा 10-15 प्रतिशत फसल उत्पादन में वृद्धि होती है ।
'''जीवाणु'''                             '''फसल जिसमें प्रयोग होते हैं'''        
 रोइजोबियम (सहजीवी) - सभी दलहनी फसलों के लिए लेकिन प्रत्येक फसल के लिए अलग-अलग   
मात्रा : एक पैकेट  (200 ग्राम) प्रति एकड़ बीज उपचारित करने के लिए ।
 एजोटोबेक्टर (स्वतंत्र जीवी) - गेहूं, बाजरा, जौ, कपास, आलू, गोभी, प्याज, टमाटर, बैंगन, भिंडी, सरसों आदि ।
           मात्रा : एक पैकेट (200 ग्राम) प्रति एकड़ उपचारित करने के लिए । 
 एजोस्पिरिलम (सहबंधी) -  अनाज वाली फसलें, ज्वार, बाजरा, गेहूं, जौ, मक्का, गन्ना आदि ।
 मात्रा : एक पैकेट (200 ग्राम) प्रति एकड़ उपचारित करने के लिए । 
 नील हरित शैवाल - धान की फसल ।
मात्रा : 10 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर पानी भरे खेत में छिड़काव के लिए । 
 माइकोराइजा - पौधशाला में तैयार होने वाली, बागवानी, फूल वाली फसलों के साथ गन्ना तथा अन्य सभी
 फसलों के लिए ।
मात्रा : 10-12 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर ।
 माइब्रफोपफास - सभी फसलों के लिए ।
मात्रा :  एक पैकेट (200 ग्राम) प्रति एकड़ बीज उपचारित करने  के लिए । 
 
'''नील हरित शैवाल-''' ये शैवाल मिट्टी के सदृश्य सूखी पपड़ी के टुकड़ों के रूप में होते हैं । यह धान की फसल के लिए जिनमें कि पानी भरा रहता है लाभकारी है । ये सूक्ष्म जीवाणु 20-30 कि.ग्रा. नाइट्रोजन (पोषक तत्वों के रूप में) प्रति हैक्टर उपलब्ध कराने में तथा 10-15 प्रतिशत फसल की पैदावार बढ़ाने में सक्षम होते हैं । इनके प्रयोग से लगभग 30 प्रतिशत तक रसायनिक उर्वरकों की बचत की जा सकती है ।
 
'''फासफेडिका कल्चर-''' फासफेडिका जीवाणु खाद, स्वतंत्र जीवाणुओं का एक नम चूर्ण रूप में उत्पाद है । जब हम खेत में उपरोक्त कल्चर का प्रयोग करते हैं तो जमीन में पड़े हुए अघुलनशील फास्फोरस जीवाणुओं द्वारा घुलनशील अवस्था में बदल दिया जाता है तथा इसका प्रयोग सभी फसलों में किया जाता है । फासफेडिका कल्चर के प्रयोग से फसलों में 10-12 प्रतिशत उत्पादन में वृद्धि पायी गयी है । इसके प्रयोग करने से 20-25 कि.ग्रा. फास्फोरस प्रति है कि बचत संभव है । जड़ों का विकास अधिक होता है जिससे पौधा स्वस्थ होता है ।
 
'''एजोस्पाइरिलम कल्चर-''' यह जीवाणु खाद मृदा में पौधों के जड़ क्षेत्र में स्वतंत्र रूप से रहने वाले जीवाणुओं का एक नमचूर्ण उत्पाद है । जो वायुमंडल की नाइट्रोजन का स्थिरीकरण कर पौधों को उपलब्ध कराते हैं । यह जीवाण खाद खरीफ के मौसम में धान, मोटे अनाज तथा गन्ने की फसल के लिए विशेष उपयोगी है । इसके प्रयोग से फसलोत्पादन में 10-12 प्रतिशत वृद्धि होती है तथा 15-20 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर नाइट्रोजन की बचत होती है । 
जैविक व हरी खादों में औसत पोषक तत्व प्रतिशत
जैविक खाद                                          पोषक तत्व (प्रतिशत)
                                    नाइट्रोजन                'फास्फोरस                पोटाश
फार्मयार्ड खाद                     0.80                      0.41                     0.74
कम्पोस्ट खाद                     1.24                     1.92                      1.07
वर्मी कम्पोस्ट                     1.60                      2.20                     0.67
धान पुआल की खाद              1.59                      1.34                     1.37
गेहूं भूसा की खाद                 2.90                      2.05                     0.90
जलकुंभी                           2.0                       1.0                       2.30 
 

  • केंचुआ खाद या वर्मीकम्पोस्ट (Vermicompost) पोषण पदार्थों से भरपूर एक उत्तम जैव उर्वरक है। यह केंचुआ आदि कीड़ों के द्वारा वनस्पतियों एवं भोजन के कचरे आदि को विघटित करके बनाई जाती है।वर्मी कम्पोस्ट में बदबू नहीं होती है और मक्खी एवं मच्छर नहीं बढ़ते है तथा वातावरण प्रदूषित नहीं होता है। तापमान नियंत्रित रहने से जीवाणु क्रियाशील तथा सक्रिय रहते हैं। वर्मी कम्पोस्ट डेढ़ से दो माह के अंदर तैयार हो जाता है। इसमें 2.5 से 3% नाइट्रोजन, 1.5 से 2% सल्फर तथा 1.5 से 2% पोटाश पाया जाता है।

केंचुआ खाद की विशेषताएँ : 

 

  • इस खाद में बदबू नहीं होती है, तथा मक्खी, मच्छर भी नहीं बढ़ते है जिससे वातावरण स्वस्थ रहता है। इससे सूक्ष्म पोषित तत्वों के साथ-साथ नाइट्रोजन 2 से 3 प्रतिशत, फास्फोरस 1 से 2 प्रतिशत, पोटाश 1 से 2 प्रतिशत मिलता है।
  • इस खाद को तैयार करने में प्रक्रिया स्थापित हो जाने के बाद एक से डेढ़ माह का समय लगता है।
  • प्रत्येक माह एक टन खाद प्राप्त करने हेतु 100 वर्गफुट आकार की नर्सरी बेड पर्याप्त होती है।
  •  केचुँआ खाद की केवल 2 टन मात्रा प्रति हैक्टेयर आवश्यक है।

 

केंचुआ खाद तैयार करने की विधि

  • जिस कचरे से खाद तैयार की जाना है उसमे से कांच, पत्थर, धातु के टुकड़े अलग करना आवश्यक हैं।
  • केचुँआ को आधा अपघटित सेन्द्रित पदार्थ खाने को दिया जाता है।
  • भूमि के ऊपर नर्सरी बेड तैयार करें, बेड को लकड़ी से हल्के से पीटकर पक्का व समतल बना लें।
  • इस तह पर 6-7 से0मी0 (2-3 इंच) मोटी बालू रेत या बजरी की तह बिछायें।
  • बालू रेत की इस तह पर 6 इंच मोटी दोमट मिट्टी की तह बिछायें। दोमट मिट्टी न मिलने पर काली मिट्टी में रॉक पाऊडर पत्थर की खदान का बारीक चूरा मिलाकर बिछायें।
  • इस पर आसानी से अपघटित हो सकने वाले सेन्द्रिय पदार्थ की (नारीयल की बूछ, गन्ने के पत्ते, ज्वार के डंठल एवं अन्य) दो इंच मोटी सतह बनाई जावे।
  • इसके ऊपर 2-3 इंच पकी हुई गोबर खाद डाली जावे।
  • केचुँओं को डालने के उपरान्त इसके ऊपर गोबर, पत्ती आदि की 6 से 8 इंच की सतह बनाई जावे। अब इसे मोटी टाट् पट्टी से ढांक दिया जावे।
  • झारे से टाट पट्टी पर आवश्यकतानुसार प्रतिदिन पानी छिड़कते रहे, ताकि 45 से 50 प्रतिशत नमी बनी रहे। अधिक नमी/गीलापन रहने से हवा अवरूद्ध हो जावेगी और सूक्ष्म जीवाणु तथा केचुएं कार्य नहीं कर पायेगे और केचुएं मर भी सकते है।
  • नर्सरी बेड का तापमान 25 से 30 डिग्री सेन्टीग्रेड होना चाहिए।
  • नर्सरी बेड में गोबर की खाद कड़क हो गयी हो या ढेले बन गये हो तो इसे हाथ से तोड़ते रहना चाहिये, सप्ताह में एक बार नर्सरी बेड का कचरा ऊपर नीचे करना चाहिये।
  • 30 दिन बाद छोटे छोटे केंचुए दिखना शुरू हो जावेंगे।
  • 31 वें दिन इस बेड पर कूड़े-कचरे की 2 इंच मोटी तह बिछायें और उसे नम करें।
  • इसके बाद हर सप्ताह दो बार कूडे-कचरे की तह पर तह बिछाएं। बॉयोमास की तह पर पानी छिड़क कर नम करते रहें।
  • 3-4 तह बिछाने के 2-3 दिन बाद उसे हल्के से ऊपर नीचे कर देवें और नमी बनाए रखें।
  • 42 दिन बाद पानी छिड़कना बंद कर दें।
  • इस पद्धति से डेढ़ माह में खाद तैयार हो जाता है यह चाय के पाउडर जैसा दिखता है तथा इसमें मिट्टी के समान सोंधी गंध होती है।
  • खाद निकालने तथा खाद के छोटे-छोटे ढेर बना देवे। जिससे केचुँए, खाद की निचली सतह में रह जावे।
  • खाद हाथ से अलग करे। गैती, कुदाली, खुरपी आदि का प्रयोग न करें।
  • केंचुए पर्याप्त बढ़ गए होंगे आधे केंचुओं से पुनः वही प्रक्रिया दोहरायें और शेष आधे से नया नर्सरी बेड बनाकर खाद बनाएं। इस प्रकार हर 50-60 दिन बाद केंचुए की संख्या के अनुसार एक दो नये बेड बनाए जा सकते हैं और खाद आवश्यक मात्रा में बनाया जा सकता है।
  • नर्सरी को तेज धूप और वर्षा से बचाने के लिये घास-फूस का शेड बनाना आवश्यक है।
  • केचुँए से भूमि की गुणवत्ता में सुधार आता है।
  • भूमि की जलधारण क्षमता बढ़ती है।
  • भूमि का उपयुक्त तापक्रम बनाये रखने में सहायक।
  • भूमि से पानी का वाष्पीकरण कम होगा। अतः सिंचाई जल की बचत होगी। केचुँए नीचे की मिट्टी ऊपर लाकर उसे उत्तम प्रकार की बनाते हैं।
  • केचुँआ खाद में ह्यूमस भरपूर मात्रा में होने से नाइट्रोजन, फास्फोरस पोटाश एवं अन्य सूक्ष्म द्रव्य पौधों को भरपूर मात्रा में व जल्दी उपलब्ध होते हैं।
  • भूमि में उपयोगी जीवाणुओं की संख्या में वृद्धि होती है।
  • सिंचाई के अंतराल में वृद्धि होती है।
  • रासायनिक खाद पर निर्भरता कम होने के साथ काश्त-लागत में कमी आती है।
  • भूमि के जलस्तर में वृद्धि होती है।
  • मिट्टी खाद्य पदार्थ और जमीन में पानी के माध्यम से होने वाले प्रदूषण में कमी आती है।
  • कचरे का उपयोग खाद बनाने में होने से बीमारियों में कमी होती है।
  • केचुँए से प्राप्त कीमती अमीनों ऐसिड्स एवं एनजाइमस् से दवाये तैयार की जाती है।
  • पक्षी, पालतू जानवर, मुर्गियां तथा मछिलयों के लिये केचुँए का उपयोग खाद्य सामग्री के रूप में किया जाता है।
  • आयुर्वेदिक औषधियां तैयार करने में इसका उपयोग होता है।
  • पाउडर, लिपिस्टिक, मलहम इस तरह के कीमती प्रसाधन तैयार करने हेतु केचुँए का उपयोग होता है।
  • केचुँए के सूखे पाउडर में 60 से 65 प्रतिशत प्रोटीन होता है, जिसका उपयोग खाने में किया जाता है।
  • यह भूमि की उर्वरकता, वातायनता को तो बढ़ाता ही हैं, साथ ही भूमि की जल सोखने की क्षमता में भी वृद्धि करता हैं।
  • वर्मी कम्पोस्ट वाली भूमि में खरपतवार कम उगते हैं तथा पौधों में रोग कम लगते हैं।
  • पौधों तथा भूमि के बीच आयनों के आदान प्रदान में वृद्धि होती हैं।
  • वर्मी कम्पोस्ट का उपयोग करने वाले खेतों में अलग अलग फसलों के उत्पादन में 25-300% तक की वृद्धि हो सकती हैं।
  • मिट्टी में पोषक तत्वों की मात्रा बढ़ जाती हैं।
  • वर्मी कम्पोस्ट युक्त मिट्टी में नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश का अनुपात 5:8:11 होता हैं अतः फसलों को पर्याप्त पोषक तत्व सरलता से उपलब्ध हो जाते हैं।
  • केचुओं के मल में पेरीट्रापिक झिल्ली होती हैं, जो जमीन से धूल कणों को चिपकाकर जमीन का वाष्पीकरण होने से रोकती हैं।
  • केचुओं के शरीर का 85% भाग पानी से बना होता हैं इसलिए सूखे की स्थिति में भी ये अपने शरीर के पानी के कम होने के बावजूद जीवित रह सकते हैं तथा मरने के बाद भूमि को नाइट्रोजन प्रदान करते हैं।
  • वर्मी कम्पोस्ट मिट्टी में कार्बनिक पदार्थों की वृद्धि करता हैं तथा भूमि में जैविक क्रियाओं को निरंतरता प्रदान करता हैं।
  • इसका प्रयोग करने से भूमि उपजाऊ एवं भुरभुरी बनती हैं।
  • यह खेत में दीमक एवं अन्य हानिकारक कीटों को नष्ट कर देता हैं। इससे कीटनाशक की लागत में कमी आती हैं।
  • इसके उपयोग के बाद 2-3 फसलों तक पोषक तत्वों की उपलब्धता बनी रहती हैं।
  • मिट्टी में केचुओं की सक्रियता के कारण पौधों की जड़ों के लिए उचित वातावरण बना रहता हैं, जिससे उनका सही विकास होता हैं।
  • यह कचरा, गोबर तथा फसल अवशेषों से तैयार किया जाता हैं, जिससे पर्यावरण प्रदूषित नहीं होता हैं।
  • इसके प्रयोग से सिंचाई की लागत में कमी आती हैं।
  • लगातार रासायनिक खादों के प्रयोग से कम होती जा रही मिट्टी की उर्वरकता को इसके उपयोग से बढ़ाया जा सकता हैं।
  • इसके प्रयोग से फल, सब्जी, अनाज की गुणवत्ता में सुधार आता हैं, जिससे किसान को उपज का बेहतर मूल्य मिलता हैं।
  • केंचुए में पाए जाने वाले सूक्ष्मजीव मिट्टी का pH संतुलित करते हैं।
  • उपभोक्ताओं को पौष्टिक भोजन की प्राप्ति होती हैं।
  • ग्रामीण क्षेत्रों में इसके उपयोग से रोजगार की संभावनाएं उपलब्ध हो जाती हैं।
  • यह बहुत कम समय में तैयार हो जाता हैं।
  • केंचुए नीचे की मिट्टी को ऊपर लाकर उसे उत्तम प्रकार की बनाते हैं।
  • जमीन में केचुँआ खाद का उपयोग करने के बाद रासायनिक खाद व कीटनाशक दवा का उपयोग न करें।
  • केचुँआ को नियमित अच्छी किस्म का सेन्द्रिय पदार्थ देते रहना चाहिये।
  • उचित मात्रा में भोजन एवं नमी मिलने से केचुँए क्रियाशील रहते है।

केंचुआ और केंचुआ खाद के उपयोग

मिट्टी की दृष्टि से :-  

  • केचुँए से भूमि की गुणवत्ता में सुधार आता है।
  • भूमि की जलधारण क्षमता बढ़ती है।
  • भूमि का उपयुक्त तापक्रम बनाये रखने में सहायक।
  • भूमि से पानी का वाष्पीकरण कम होगा। अतः सिंचाई जल की बचत होगी। केचुँए नीचे की मिट्टी ऊपर लाकर उसे उत्तम प्रकार की बनाते हैं।
  • केचुँआ खाद में ह्यूमस भरपूर मात्रा में होने से नाइट्रोजन, फास्फोरस पोटाश एवं अन्य सूक्ष्म द्रव्य पौधों को भरपूर मात्रा में व जल्दी उपलब्ध होते हैं।
  • भूमि में उपयोगी जीवाणुओं की संख्या में वृद्धि होती है।

कृषकों की दृष्टि से :-  

  • सिंचाई के अंतराल में वृद्धि होती है।
  • रासायनिक खाद पर निर्भरता कम होने के साथ काश्त-लागत में कमी आती है।

पर्यावरण की दृष्टि से :-  

  • भूमि के जलस्तर में वृद्धि होती है।
  • मिट्टी खाद्य पदार्थ और जमीन में पानी के माध्यम से होने वाले प्रदूषण में कमी आती है।
  • कचरे का उपयोग खाद बनाने में होने से बीमारियों में कमी होती है।

अन्य उपयोग :

  • केचुँए से प्राप्त कीमती अमीनों ऐसिड्स एवं एनजाइमस् से दवाये तैयार की जाती है।
  • पक्षी, पालतू जानवर, मुर्गियां तथा मछिलयों के लिये केचुँए का उपयोग खाद्य सामग्री के रूप में किया जाता है।
  • आयुर्वेदिक औषधियां तैयार करने में इसका उपयोग होता है।
  • पाउडर, लिपिस्टिक, मलहम इस तरह के कीमती प्रसाधन तैयार करने हेतु केचुँए का उपयोग होता है।
  • केचुँए के सूखे पाउडर में 60 से 65 प्रतिशत प्रोटीन होता है, जिसका उपयोग खाने में किया जाता है।

केंचुआ खाद का महत्व :

  • यह भूमि की उर्वरकता, वातायनता को तो बढ़ाता ही हैं, साथ ही भूमि की जल सोखने की क्षमता में भी वृद्धि करता हैं।
  • वर्मी कम्पोस्ट वाली भूमि में खरपतवार कम उगते हैं तथा पौधों में रोग कम लगते हैं।
  • पौधों तथा भूमि के बीच आयनों के आदान प्रदान में वृद्धि होती हैं।
  • वर्मी कम्पोस्ट का उपयोग करने वाले खेतों में अलग अलग फसलों के उत्पादन में 25-300% तक की वृद्धि हो सकती हैं।
  • मिट्टी में पोषक तत्वों की मात्रा बढ़ जाती हैं।
  • वर्मी कम्पोस्ट युक्त मिट्टी में नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश का अनुपात 5:8:11 होता हैं अतः फसलों को पर्याप्त पोषक तत्व सरलता से उपलब्ध हो जाते हैं।
  • केचुओं के मल में पेरीट्रापिक झिल्ली होती हैं, जो जमीन से धूल कणों को चिपकाकर जमीन का वाष्पीकरण होने से रोकती हैं।
  • केचुओं के शरीर का 85% भाग पानी से बना होता हैं इसलिए सूखे की स्थिति में भी ये अपने शरीर के पानी के कम होने के बावजूद जीवित रह सकते हैं तथा मरने के बाद भूमि को नाइट्रोजन प्रदान करते हैं।
  • वर्मी कम्पोस्ट मिट्टी में कार्बनिक पदार्थों की वृद्धि करता हैं तथा भूमि में जैविक क्रियाओं को निरंतरता प्रदान करता हैं।
  • इसका प्रयोग करने से भूमि उपजाऊ एवं भुरभुरी बनती हैं।
  • यह खेत में दीमक एवं अन्य हानिकारक कीटों को नष्ट कर देता हैं। इससे कीटनाशक की लागत में कमी आती हैं।
  • इसके उपयोग के बाद 2-3 फसलों तक पोषक तत्वों की उपलब्धता बनी रहती हैं।
  • मिट्टी में केचुओं की सक्रियता के कारण पौधों की जड़ों के लिए उचित वातावरण बना रहता हैं, जिससे उनका सही विकास होता हैं।
  • यह कचरा, गोबर तथा फसल अवशेषों से तैयार किया जाता हैं, जिससे पर्यावरण प्रदूषित नहीं होता हैं।
  • इसके प्रयोग से सिंचाई की लागत में कमी आती हैं।
  • लगातार रासायनिक खादों के प्रयोग से कम होती जा रही मिट्टी की उर्वरकता को इसके उपयोग से बढ़ाया जा सकता हैं।
  • इसके प्रयोग से फल, सब्जी, अनाज की गुणवत्ता में सुधार आता हैं, जिससे किसान को उपज का बेहतर मूल्य मिलता हैं।
  • केंचुए में पाए जाने वाले सूक्ष्मजीव मिट्टी का pH संतुलित करते हैं।
  • उपभोक्ताओं को पौष्टिक भोजन की प्राप्ति होती हैं।
  • ग्रामीण क्षेत्रों में इसके उपयोग से रोजगार की संभावनाएं उपलब्ध हो जाती हैं।
  • यह बहुत कम समय में तैयार हो जाता हैं।
  • केंचुए नीचे की मिट्टी को ऊपर लाकर उसे उत्तम प्रकार की बनाते हैं।

केंचुआ खाद के उपयोग में सावधानियाँ :- 

  • जमीन में केचुँआ खाद का उपयोग करने के बाद रासायनिक खाद व कीटनाशक दवा का उपयोग न करें।
  • केचुँआ को नियमित अच्छी किस्म का सेन्द्रिय पदार्थ देते रहना चाहिये।
  • उचित मात्रा में भोजन एवं नमी मिलने से केचुँए क्रियाशील रहते है।

                                केंचुआ खाद और कम्पोस्ट खाद की तुलना  

 

केंचुआ खाद

कम्पोस्ट खाद

पकने की अवधि

1-1.5 माह

4 माह

पोषक तत्व

 

 

नाइट्रोजन

2.5-3.0 प्रतिशत

0.5-1.5 प्रतिशत

फास्फोरस

1.5-2.0 प्रतिशत

0.5-0.9 प्रतिशत

पोटाश

1.5-2.0 प्रतिशत

1.2-1.4 प्रतिशत

सूक्ष्म एवं अन्य पदार्थ

अपेक्षाकृत मात्रा अधिक

मात्रा कम

प्रति एकड़ आवश्यकता

2 टन

5 टन

वातावरण पर प्रभाव

खाद में बदबू नहीं होती। मक्खी, मच्छर आदि भी नहीं बढ़ते। अतः वातावरण दूषित नहीं होता। तापमान नियंत्रित रहने से जीवाणु क्रियाशील/सक्रिय रहते है।

खाद बनाते समय प्रारंभिक अवस्था में बदबू होती है और मक्खी, मच्छर आदि बढ़ जाते है जिससे वातावरण दूषित होता है। तापमान नियंत्रित नहीं रहने से जीवाणुओं की क्रियाशीलता/सक्रियता कम हो जाती है।