• नगरपालिकाबोर्ड द्वारा शहर के सौन्दर्य को बढ़ावा देने के लिए किए जा रहे कार्यों में 56 लाख के कार्य और जुड़ गए हैं। नगरपालिका द्वारा शहर की सीमा पर जयपुर एवं पाली की तरफ विशाल एवं भव्य प्रवेश द्वारों का निर्माण करवाया जाएगा। पालिकाध्यक्ष श्री दिनेश कुमार मीणा ने बताया कि शहर में चारों ओर सौन्दर्यकरण का कार्य चल रहा है। नगरपालिका सीमा में पाली एवं जयपुर की तरफ से प्रवेश सीमा पर 26 -26 लाख की लागत से दो प्रवेश द्वारों का निर्माण करवाया जाएगा।

जनवरी

राजमा, शिमला मिर्च, मूली, पालक, बैंगन, चप्‍पन कद्दू

फरवरी

राजमा, शिमला मिर्च, खीरा-ककड़ी, लोबिया, करेला, लौकी, तुरई, पेठा, खरबूजा, तरबूज, पालक, फूलगोभी, बैंगन, भिण्‍डी, अरबी, एस्‍पेरेगस, ग्‍वार

 मार्च

ग्‍वार, खीरा-ककड़ी, लोबिया, करेला, लौकी, तुरई, पेठा, खरबूजा, तरबूज, पालक, भिण्‍डी, अरबी

अप्रैल

चौलाई, मूली

मई

फूलगोभी, बैंगन, प्‍याज, मूली, मिर्च

जून

फूलगोभी, खीरा-ककड़ी, लोबिया, करेला, लौकी, तुरई, पेठा, बीन, भिण्‍डी, टमाटर, प्‍याज, चौलाई, शरीफा

जुलाई

खीरा-ककड़ी-लोबिया, करेला, लौकी, तुरई, पेठा, भिण्‍डी, टमाटर, चौलाई, मूली

अगस्‍त

गाजर, शलगम, फूलगोभी, बीन, टमाटर, कालीसरसोंकेबीज, पालक, धनिया, ब्रसल्‍सस्‍प्राउट, चौलाई

सितंबर

गाजर, शलगम, फूलगोभी, आलू, टमाटर, काली सरसों के बीज, मूली, पालक, पत्‍ता गोभी, कोहीराबी, धनिया, सौंफ के बीज, सलाद, ब्रोकोली

अक्टूबर 

गाजर, शलगम, फूलगोभी, आलू, टमाटर, काली सरसों के बीज, मूली, पालक, पत्‍ता गोभी, कोहीराबी, धनिया, सौंफ के बीज, राजमा, मटर, ब्रोकोली, सलाद, बैंगन, हरी प्‍याज, ब्रसल्‍स स्‍प्राउट, लहसुन

नवम्‍बर

चुकन्‍दर, शलगम, फूलगोभी, टमाटर, काली सरसों के बीज, मूली, पालक, पत्‍ता गोभी, शिमला मिर्च, लहसुन, प्‍याज, मटर, धनिया

दिसम्‍बर

टमाटर, कालीसरसोंकेबीज, मूली, पालक, पत्‍तागोभी, सलाद, बैंगन, प्‍याज

 

एंटी आक्सीडेंट का सबसे बेहतर सोर्स लेमनग्रास में विटामिन सी भारी मात्रा में होता है। दुनिया की एक बड़ी आबादी इसकी चाय यानी लेमन-टी पीने लगी है। लेकिन लेमनग्रास ऑयल (तेल) का सबसे ज्यादा इस्तेमाल परफ्यूम और कास्मेटिक उद्योग में होता है। जैसे जैसे ये इंड्रस्ट्री बढ़ रही है लेमनग्रास की भी मांग बढ़ी है। इसलिए किसानों के लिए ये फायदे का खेती बनती जा रही है। किसानों की आमदनी बढ़ाने की कवायद में जुटी सरकार पूरे देश में एरोमा मिशन के तहत इसकी खेती को बढ़ावा भी दे रही है, लेमनग्रास की खूबी ये है कि इसे सूखा प्रभावित इलाकों में भी लगाया जा सकता है। लेमनग्रास को नींबू घास, मालाबार या कोचिन घास भी कहते हैं। भारत समेत ये उन देशों में पाया जाता है जहां की जलवायु गर्म है।


भारत सालाना करीब 700 टन नींबू घास के तेल का उत्पादन करता है, जिसकी एक बड़ी मात्रा निर्यात की जाती है। भारत का लेमनग्रास तेल किट्रल की उच्च गुणवत्ता के चलते हमेशा मांग में रहता है। 2022 तक किसानों की आमदनी दोगुनी करने के वादे को पूरा करने की कवायद में जुटी भारत सरकार ने एरोमा मिशन के तहत जिन औषधीय और सगंध पौधों की खेती का रकबा बढ़ा रही है उसमें एक लेनमग्रास भी है। लेमनग्रास की खेती सूखा प्रभावित इलाकों जैसे मराठवाड़ा, विदर्भ और बुंदेलखंड तक में की जा रही है। सीमैप के गुणाभाग और शोध के मुताबिक एक हेक्टेयर लेमनग्रास की खेती में शुरु में 30000 से 40000 हजार की लागत आती है। एक बार फसल लगाने के बाद साल में 3 से 4 कटाई ली जा सकती हैं, जिससे करीब 100-150 किलो तेल निकलता है। इस तरह से एक लाख से एक लाख 60 हजार तक आमदनी हो सकती है, खर्चा निकालने के बाद एक हेक्टेयर में किसान को प्रतिवर्ष 70 हजार से एक लाख 20 हजार तक का शुद्ध मुनाफा हो सकता है। मेंथा और खस की तरह ही लेमनग्रास की पेराई होती है, और पेराई संयंत्र भी लगभग एक जैसा ही होता है। पत्तियां काटकर उन्हें टंकी में भरकर आसवन किया जाता है।

 नर्सरी, रोपाई और निराई-गुड़ाई

लेमनग्रास की जड़ लगाई जाती है, जिसके लिए पहले नर्सरी तैयार की जाए तो लागत कम हो सकती है। अप्रैल से लेकर मई तक इसकी नर्सरी तैयार की जाती है, एक हेक्टेयर की नर्सरी के लिए लेमनग्रास के करीब 10 किलो बीज की आवश्यकता होगी। 55-60 दिन में नर्सरी रोपाई के लिए तैयार हो जाती है। यानि जुलाई अगस्त में तैयार नर्सरी यानि स्लिप (जड़ समेत एक पत्ती) को कतार में 2-2 फीट की दूरी पर लगाना चाहिए। हर तरह की मिट्टी और जलवायु में पैदा होनी वाली इस फसल में गोबर की खाद और लकड़ी की राख सबसे ज्यादा फायदा करती है। लेमनग्रास को ज्यादा निराई गुड़ाई की जरुरत नहीं होती, साल में दो से तीन निराई गुड़ाई पर्याप्त हैं। ज्यादा सूखे इलाकों में पूरे साल में 8-10 सिंचाई की जरुरत होगी।
उत्तर प्रदेश में ऐसी फसलों पर शोध के लिए कन्नौज में सुगंध एवं सुरस विकास केंद्र (एफएफडीसी) है। यहां के अवर शोधकर्ता कमलेश कुमार ने पिछले दिनों गांव कनेक्शन को इसके फायदे गिनाते हुए बताया, इसकी पत्ती से लेमन-टी यानि नीबू चाय के साथ साबुन, निरमा, डिटर्जेंट, तेल, हेयर आयल, मच्छर लोशन, सिरदर्द की दवा व कास्मेटिक बनाने में भी प्रयोग किया जाता है।"

यूपी में सीतापुर जिले के बंभौरा गांव निवासी प्रगतिशील किसान हर्षचंद वर्मा के मुताबिक इसमें कीट-पतंगे रोग नहीं लगते हैं, लेकिन एक कोई रोक का प्रकोप दिखे तो नीम की पत्तियों को गोमूत्र में मिलाकर छिड़काव किया जा सकता है।

जानकारों के मुताबिक लेमग्रास का तेल जिस परफ्यूम,डियो या क्रीम आदि में पड़ा होता है उसके उपयोग से लोगों में ताजगी आ जाती है। चीन में कहीं-कहीं पर इसे सिरदर्द ,पेटदर्द में उपयोग करते हैं, इसके कुछ गुण मुंहासे ठीक करने में भी काम आते हैं। भारत में सर्दी जुखाम के दौरान काफी लोग इसका गाढ़ा पीते हैं।

उत्तर प्रदेश, राजस्थान, बिहार, असम, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल और कर्नाटक समेत कई राज्यों में इसकी बड़े पैमाने पर खेती हो रही है।

लेमनग्रास की खेती में कमाई और मुनाफे का गणित प्रति हेक्टेयर सलाना लागत- 40,000 रुपए (सिंचाई समेत) 30,000 रुपए (बिना सिंचाई) कुल उत्पादन से कमाई- 1,60,000 रुपए (सिंचाई समेत) 1,00,000 रुपए (बिना सिंचाई) शुद्ध मुनाफा (सालाना) 1,20,000 रुपए (सिंचाई समेत) 70.000 रुपए (बिना सिंचाई)

नोट- उपरोक्त आंकड़े सीमैप (2018) की किसानों को वितरित की गई किताब से हैं। आंकड़े बाजार भाव और उत्पादन के मुताबिक कम ज्यादा हो सकते हैं।